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सृजन समूह शामली, उत्तर प्रदेश

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शनिवार, 4 जून 2022

भारतीय संस्कृति

 तिलक लगाना

हमारी भारतीय संस्कृति में तिलक का बड़ा महत्व है । कोई भी मांगलिक कार्य बिना तिलक के पूर्ण नहीं होता है। सभी कार्य में पहले तिलक लगाने का प्रावधान होता है । तिलक का तत्व दर्शन अपने आप में अनेक प्रेरणाएं संजोये हुए है । तिलक त्रिपुंड प्रायः चन्दन का होता है। चन्दन की प्रकृति शीतल होती है । चिंतन का केन्द्रीय संस्थान जो मस्तिष्क के रूप में खोपड़ी के अन्दर स्थिति है वह चन्दन के लेप से हमेशा शीतल बना रहता है। उसके विचार व भाव इतने श्रेष्ठ होते हैं कि वह स्वयं भी सदा प्रसन्न रहता है और अपनी तरह औरों को भी शीतलता और प्रसन्नता प्रदान करता है ।

तिलक लगाने के प्रकार व विधि :- सामान्यतः तिलक चन्दन, कुंकुम, हल्दी, यज्ञ की राख, गोधूलि, तुलसी या पीपल की जड़ की मिट्टी आदि का लगाया जाता है । चन्दन का तिलक लगाने से पापों का नाश होता है, व्यक्ति संकटों से बचता है, उस पर लक्ष्मी की कृपा हमेशा बनी रहती है, ज्ञानतंतु, संयमित व सक्रिय रहते हैं । श्वेत और रक्त चन्दन भक्ति के प्रतीक हैं । केसर एवं गौरोचन ज्ञान तथा वैराग्य के प्रतीक हैं । ज्ञानी, तत्वचिंतक और विरक्त ह्नदय वाले लोग इसका प्रयोग करते हैं । कुंकुम में हल्दी का संयोजन होने से त्वचा को शुद्ध रखने में सहायता मिलती है और मस्तिष्क के स्नायुओं का संयोजन प्राकृतिक रूप में हो जाता है । संक्रामक कीटाणुओं को नष्ट करने में शुद्ध मिट्टी का तिलक महत्वपूर्ण योगदान देता है । यज्ञ की भस्म का तिलक करने से सौभाग्य की वृद्धि होती है । ज्योतिषशास्त्र के अनुसार तिलक लगाने से ग्रहों की शान्ति होती है। तिलक करते समय अंगुलियों के प्रयोग का तरीका :-

अनामिका शान्तिदा प्रोक्ता मध्यमायुष्यकरी भवेत।

अंगुष्ठ पुष्टिदः प्रोक्ता तर्जनी मोक्षादायिनी।।

अनामिका से तिलक करने से सुख शान्ति, मध्यमा से आयु, अंगूठे से स्वास्थ्य और तर्जनी से मोक्ष की प्राप्ति होती है। (स्कन्द पुराण) तर्जनी से लाल या श्वेत चन्दन का, मध्यमा से सिन्दूर का तथा अनामिका से केसर कस्तूरी, गोरोचन का टीका लगाना चाहिए । इनके लिए क्रमशः पूर्व दिशा, उत्तर दिशा और पश्चिम दिशा निर्धारित है । दिशाओं को ध्यान मे रखकर उस ओर मुँह करके तिलक करना चाहिए । अंगूठे से भी तिलक चंदन का किया जा सकता है । ललाट पर दोनों भौहों के बीच विचार शक्ति का केन्द्र है । योगी इसे आज्ञाचक्र कहते हैं । इसे शिवनेत्र अर्थात कल्याणकारी कहा जाता है । वैज्ञानिकों ने इसे पीनियल ग्रंथि नाम दिया है । अनेक प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि इसका प्रकाश से गहरा सम्बन्ध है । ध्यान धारणा के माध्यम से साधन में जो प्रकाश का अवतरण आज्ञाचक्र में होता है । उसका कोई न कोई संबंध इस स्थूल अवयव से जरूर होता है । हमारे ऋषि मुनि इस बात को अच्छी तरह जानते थे । अतः उन्होंने तिलक की प्रथा को पूजा उपासना के साथ-साथ हर शुभ कार्य से जोड़कर इसे धर्म कर्म का एक अभिन्न अंग बना दिया ताकि नियमित रूप से उस स्थान के स्पर्श से उसे उद्दीपन मिलता रहे और वहां से सम्बन्ध स्थूल सूक्ष्म अवयव जागरण की प्रक्रिया से जुड़े रहे । माथे पर तिलक, टीका या बिन्दी लगाने की परम्परा बड़ी प्राचीन है । स्नान किया और पूजा-अर्चना करने से पहले तिलक लगाया । मन्दिर में गये तो पुजारी ने हमारे माथे पर टीका लगा दिया कोई मांगलिक कार्य हुआ तो तिलक लगाया । स्वागत में तिलक किया और विदाई के समय भी तिलक किया । बालकों के तिलक लगाते हैं और कन्याओं के टीका करते हैं । कन्या का विवाह होता है तो वह माथे पर लगातार टीका लगाये रखती है । कोई भी सुख का अवसर हो, महालक्ष्मी की पूजा हो, सरस्वती जी की पूजा हो, हवन हो, सत्यनारायण जी की कथा हो, रामायण का पाठ हो, सभी अवसरों पर तिलक अवश्य लगाया जाता है ।

इसलिये तिलक हमारे जन-जीवन में गहरा बैठा हुआ है और यह अकारण नहीं है । एक बहुत गहरा विज्ञान है, बड़ी महत्व की बात जुड़ी है इस परम्परा के साथ । आप कभी दोनों भौहों के बीच थोड़ा सा ऊपर अपना ध्यान केन्द्रित करें और कोई संकल्प करें । निश्चित है कि वह संकल्प पूरा होगा । यह जो भ्रूमध्य के कुछ ऊपर का जो स्थान है वह एक बिन्दु के रूप में है और इसे तीसरी आंख कहा जाता है । योग की भाषा में इसे आज्ञाचक्रकहते हैं । पौराणिक कथाओं में शिवजी के तीसरे नेत्र के खुलने के आख्यान बार-बार आते हैं । तीसरा नेत्र खुलते ही प्रलय हो जाती है अर्थात् यह तीसरा नेत्र या आज्ञा-चक्र असीम ऊर्जा उत्पन्न करने की क्षमता रखता है । यह खुल सकता है, किसी भी व्यक्ति का तीसरा नेत्र सक्रिय किया जा सकता है । तीसरे नेत्र या आज्ञाचक्र को जानने की, इसे सक्रिय करने की पहली सीढ़ी हैं तिलक-टीके । तिलक वहीं लगता है जहां मस्तक के भीतर तीसरी आंख का बिन्दु है । हमें ध्यान रहे कि हमारा आज्ञाचक्र, हमारा तीसरा नेत्र किस स्थान पर है । लगातार हमें यह ध्यान रहे तो तीसरी आंख के सक्रिय होने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है । इसलिये प्रतिदिन उसी स्थान पर टीका लगाया जाता है । जैसे-जैसे व्यक्ति की साधना बढ़ती है तीसरे नेत्र का बिन्दु नीचे खिसकने लगता है और ठीक भ्रूमध्य में जाने पर सक्रिय हो जाता है । दीक्षा के समय गुरू अपने हाथ का अंगूठा शिष्य के मस्तक पर वहीं रखता है जहां उसका आज्ञा चक्र होता है । यह शिष्य के आज्ञा-चक्र की सक्रियता शुरू करने का उपक्रम है ।

कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि मनुष्य अपने जीवन-काल में मस्तिष्क के दसवें हिस्से का ही उपयोग कर पाता है । हाल ही में वैज्ञानिकों ने बताया कि आधे मस्तिष्क का थोड़ा-बहुत उपयोग व्यक्ति कर लेता है, लेकिन दिमाग का आधा हिस्सा तो बेकार ही पड़ा रहता है । दुनिया के सबसे बुद्धिमान, सबसे मेधावी व्यक्ति का भी आधा मस्तिष्क बिना उपयोग के ही रह जाता है । प्राचीन भारत के वैज्ञानिकों ने, ऋषियों ने बताया कि आज्ञा-चक्र या तीसरी आंख को सक्रिय करने से पूरे मस्तिष्क का उपयोग हो सकता है । जिस आधे दिमाग को काम में लिया ही नहीं जाता उसमें अचम्भित कर देने वाली क्षमताएं होती हैं । अमेरिका के एडगर कैसी के बारे में हमने पढ़ा है । एडगर कैसी को दूसरे मनुष्यों के शरीर में झांकने, उनके पिछले जन्मों का विवरण जानने तथा घर में बैठे हुए दूर तक जाने व देखने की क्षमता तीसरा नेत्र खुल जाने के कारण ही आई ।

तिलक-टीके हमें लगातार हमारे तीसरे नेत्र का स्मरण कराते हैं, आज्ञा-चक्र का स्मरण कराते हैं । इसलिये हमने प्रत्येक मांगलिक अवसर, प्रत्येक धार्मिक आयोजन, प्रत्येक प्रसन्नता के अवसर, स्वागत-विदाई के अवसर पर तिलक लगाने का विधान रखा । हमें याद रहे कि हमारी शक्तियां असीमित हैं, हमें उन्हें जगाना है और समाज के कल्याण में लगाना है । दूसरी बात यह है कि हमारा जो आज्ञाचक्र यह मामूली सा भी सक्रिय हुआ तो आपके संकल्प को कोई तोड़ नहीं सकेगा । जीवन में अनुशासन आ जायेगा । सम-भाव आ जायेगा । इसलिये आज्ञा-चक्र को याद रखना है, जब साधना के लिये बैठना है तो इस पर ध्यान केन्द्रित करना है । तिलक का यही प्रयोजन है । तिलक धारण वस्तुतः तीसरा नेत्र जागृत करने की दशा में एक आध्यात्मिक कदम है । आज्ञाचक्र भ्रूमध्य में किया गया चन्दन या सिंदूर आदि का तिलक विचार शक्ति या आज्ञाशक्ति को विकसित करता है । इसलिए हिन्दू धर्म के कोई भी शुभ कार्य करते समय ललाट पर तिलक किया जाता है । इससे कठिन परिस्थितियों से सही निर्णय करने की क्षमता का विकास होता है । शास्त्रानुसार -

स्नानंदान तपो होमो देवता पितृकर्म च ।। तत्सर्व निष्फलम याति ललाटे तिलक विना ।।

बिना तिलक लगाये स्नान, दान, तप, हनन, देवकर्म, पितृकर्म सब कुछ निष्फल हो जाता है। (ब्रहावैवर्त पुराण) कहा जाता है कि अधिकांश स्त्रियों का मन स्वाधिष्ठान एवं मणिपूरक केन्द्र में रहता है । इन केन्द्रों में भय भाव व कल्पना की अधिकता होती है । वे भावना एवं कल्पनाओं में बह न जायें उनका शिवनेत्र, विचारशक्ति का केन्द्र विकसित हो इस उद्देश्य से ऋषियों ने अनिवार्य रूप से स्त्रियों के लिए तिलक का विधान रखा है।

वैज्ञानिकता :-

हमारे मन में जो संकल्प उठता है वह सर्वप्रथम मस्तिष्क की धमनियों में प्रकम्पन पैदा करता है । उसके बाद वह संबंधित इन्द्रियों को कार्यानुकूल होने को सज्जित करता है । अतः हमारा मस्तिष्क जितना विकार रहित होगा उतना ही हम प्रत्येक बात की वास्तविकता का शुद्ध विश्लेषण कर पायेंगे । हमारे ज्ञानतंतुओं का विचारक केन्द्र भृकुटि और ललाट का मध्य भाग है । इसलिए हमारे ऋषियों ने ज्ञानतंतुओं के केन्द्र स्थान में ही तिलक धारण करने का विधान किया है । माथे पर तिलक लगाना मानो उर्ध्वगति का संकेत चिह्नन है । बिंदिया में उपस्थित लाल तत्व पारे का रेड आक्साइड होता है । जो कि शरीर के लिए लाभदायक होता है । बिंदिया एवं शुद्ध चन्दन के प्रयोग से मुखमंडल झुर्री रहित बनता है । मांग में टीका पहनने से मस्तिष्क सम्बन्धी क्रियाएं नियंत्रित सन्तुलित तथा नियमित रहती हैं एवं मस्तिष्कीय विकार नष्ट होते हैं । लेकिन वर्तमान में जो कैमिकल्स की बिंदिया चल पड़ी है  वह लाभ के बजाय हानि करती है । ललाट पर नियमित रूप से तिलक करते रहने से मस्तिष्क के रसायन-सेराटोनिन व बीटा एंडोर्फिन का स्राव संतुलित रहता है । जिससे मनोभावों में सुधार आकर उदासी दूर होती है । सिर दर्द नहीं होता तथा मेधाशक्ति तीव्र होती है।

शिखा रखना

हम देखते है कि बहुत से लोग सिर पर शिखा (चोटी) रखते हैं । खासकर ब्राह्नाण, संत, संन्यासी व विद्वान व्यक्ति शिखा रखते हैं । यह कोई उनकी पहचान मात्र नहीं है तो फिर शिखा क्यों रखते हैं ? इसका क्या तात्पर्य है ? विद्वान कहते हैं कि शिखा वाला भाग जिसके नीचे सुषुम्ना नाड़ी होती है । कपाल तन्त्र के अन्य खुली जगहों (मुण्डन के समय यह स्थिति उत्पन्न होती है) की अपेक्षा अधिक संवेदनशील होता है । शिखा होने के कारण वातावरण से उष्मा व अन्य ब्रह्नाण्डिय विद्युत चुम्बकीय तरंगों का मस्तिष्क से आदान-प्रदान आसानी से हो जाता है । शिखा न होने की स्थिति में स्थानीय वातावरण के साथ-साथ मस्तिष्क का ताप भी बदलता रहता है । लेकिन वैज्ञानिकतः मस्तिष्क को सुचारू सर्वाधिक क्रियाशील और यथोचित उपयोग के लिए इसके ताप को नियंत्रित होना जरूरी होता है । जो शिखा न होने की स्थिति में सम्भव नहीं है क्योंकि शिखा (लगभग गोखुर के बराबर) इस ताप को आसानी से सन्तुलित कर जाती है और उष्मा की कुचालकता की स्थिति उत्पन्न करके वायुमण्डल से उष्मा के स्वतः आदान-प्रदान को रोक देती है । वर्तमान समय में लोग सिर पर छोटी सी चोटी रख लेते हैं लेकिन इसका वास्तविक रूप यह नहीं होता है । वास्तव में शिखा की आकृति गाय के पैर के खुर के बराबर होनी चाहिए । हमारे सिर के बीचों बीच सहस्त्राह चक्र होता है। शरीर में पांच चक्र बताये गए हैं मूलाधार चक्र जो रीढ़ के निचले हिस्से में होता है और आखिर है सहस्त्राह चक्र जो सिर पर होता है । इसका आकार भी गाय के खुर जितना ही होता है । शिखा रखने से इस सहस्त्राह चक्र के जाग्रत करने और शरीर बुद्धि, मन पर नियन्त्रण करने में सहायता मिलती है । शिखा का हल्का दबाव होने से रक्त प्रवाह भी तेज रहता है और मस्तिष्क को इसका लाभ मिलता है ।

शास्त्रों में कहा जाता है कि मृत्यु के समय आत्मा शरीर के द्वारों से बाहर निकलती है । मानव शरीर में नौ द्वार बताये गए हैं दो आंख, दो कान, दो नासिका छिद्र दो नीचे द्वार, एक मुँह और दसवां द्वार यही शिखा का सहस्त्राह चक्र जो सिर में होता है । कहते हैं यदि प्राण इस चक्र से निकालते हैं तो साधक की मुक्ति निश्चित है और सिर पर शिखा होने के कारण प्राण बड़ी आसानी में निकल जाते हैं और मृत्यु होने के बाद भी शरीर में कुछ अवयव ऐसे होते हैं जो आसानी से नहीं निकलते इसलिए व्यक्ति मृत्योपरान्त जलाया जाता है । सिर अपने आप फटता है और यह अवयव बाहर निकलता है । यदि सिर पर शिखा होती है तो इस अवयव को निकलने की जगह मिल जाती है । शिखा रखने से मनुष्य के तिलक तथा पारलौकिक समस्त कार्यों में सफलता प्राप्त करता है । शिखा रखने से मनुष्य प्राणायाम, अष्टायोग आदि यौगिक क्रियाओं को ठीक-ठीक कर सकता है । शिखा रखने से सभी देवता मनुष्य की रक्षा करते हैं । शिखा रखने में मनुष्य की नेत्र ज्योति सुरक्षित रहती है । शिखा रखने से मनुष्य का शरीर स्वस्थ बलिष्ठ तेजस्वी और दीर्घायु होता है । जर्मनी के प्रसिद्ध विद्वान मैक्समूलर ने लिखा है-‘‘शिखा के द्वारा मानव असीम शक्ति के प्रवाह को धारण कर सकता है’’। वैज्ञानिक सर चार्ल्स ल्यूकस ने शिखा के सम्बन्ध में कहा है- शिखा का शरीर के उस अंग से गहरा सम्बन्ध है जिससे ज्ञानवृद्धि और सभी अंगों का संचालन होता है । जब से मैंने इस विज्ञान की खोज की, तब से मैं स्वयं चोटी रखता हूँ ।’’ इंग्लैण्ड के श्री अर्ल थामन ने भी शिखा के महत्व को पहचाना । वे योग के प्रशंसक थे और नित्य योगाभ्यास करते थे । उन्होंने लिखा कि ‘‘सुषुम्ना की रक्षा हिन्दू लोग चोटी रख कर करते हैं, जबकि अन्य देशों में लोग सिर पर लम्बे बाल रख कर या हेट लगा कर इसकी रक्षा का प्रयत्न करते हैं । इन सबमें चोटी रखना सर्वाधिक उपयुक्त है ।’’ तैत्तिरीय उपनिषद् की शिक्षावल्ली के छठे अध्याय में बताया गया है कि मुख के अन्दर दोनों तालुओं के बीच में एक मांसपिण्ड लटका हुआ है उसे मस्तुलिंग कहते हैं । (बोल-चाल की भाषा में कागला कहते है ।) सुषुम्ना नाड़ी का मूल-स्थान चोटी वाले स्थान के ठीक नीचे है । अर्थात् मस्तुलिंग या कागला सुषुम्ना का मूल स्थान है । यह ज्ञान-शक्ति और कर्म-शक्ति का केन्द्र है । इसकी उष्ण प्रकृति है । अर्थात मस्तुलिंग को उष्णता की आवश्यकता होती है । इस स्थान को आवश्यक ताप देने व इसकी रक्षा के लिये चोटी रखने का प्रावधान है । शिखा का स्थान शरीर का प्रमुख मर्म-स्थल है । यहां चोट लगने से तत्काल मृत्यु हो जाती है । इसलिये इस स्थान की सुरक्षा व इसे आवश्यक ऊष्मा देने के लिए शिखा रखी जाती है । इससे ज्ञान और कर्म-शक्ति सक्रिय रहती है । शिखा को बांध कर इसलिये रखा जाता है कि मस्तुलिंग की ऊर्जा चोटी के माध्यम से बाहर न निकल सके ।

वैज्ञानिक आधार -

शरीर-विज्ञान के अनुसार शिखा वाले स्थल को पीनल ज्वाइंटकहा जाता है । इसके नीचे पिट्यूटरी ग्लेण्ड (ग्रन्थि) होती है । यह ग्रन्थि शरीर की अन्य ग्रन्थियों को सक्रिय रखती है । चिकित्सा विज्ञान के अनुसार इस ग्रन्थि से जो स्राव निकलता है वह शरीर की वृद्धि करता है और इसे बलशाली बनाता है । इसके ऊपर बालों के समूह के रूप में शिखा रखी जाती है । इससे पिट्यूटरी ग्रन्थि निरन्तर कार्य करती रहती है । शिखा-बन्धन का यह वैज्ञानिक आधार आयुर्वेद के प्राचीन ग्रन्थ अष्टांग हृदय में भी स्पष्ट किया गया है । आधुनिक युग में शिखा रखना लोगों को असहज लगता है । ऐसे व्यक्तियों को स्नान के पूर्व शिखा-स्थल पर सरसों के तेल की मालिश अवश्य करनी चाहिए । हथेली के मूल में तेल लगा कर वहां मलना चाहिये जहां चोटी रखी जाती है ।

 

 डॉ0 दिनेश कुमार गुप्ता  

प्रवक्ताअग्रवाल महिला शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय,

गंगापुर सिटीजिला-सवाई माधोपुर (राज.) 322201

 

 

 

 

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